मेरा जीवन
आज 3 महीने हो गए अपनी बेटी से मिले ,उसको देखे और उसके मासूम आंखों में भरी वो जिज्ञासु निगाहों को निहारे हुए ।अपनी पत्नी को जब छोड़ आया था तब वो अस्पताल में थी अपनी नवजात बेटी को लेकर उसकी छोटी सी काया नीले बल्ब के नीचे बस पड़ी थी ,उसकी धीरे धीरे फूलती छाती और आंखों पर बंधी काली पट्टी ,जब निकलने का समय हुआ था रात के दस बजे तब उसको बड़े जतन से सहेजकर उठाया था गोद में और मै और मेरी पत्नी बिलख बिलख कर रोए थे ,ये बिछोह बहुत मर्मांतक था जैसे कि हृदय विदिर्न हो गई हो।
फौज की वर्दी की इस कदर कीमत चुकानी पड़ेगी कभी नहीं सोचा था।
आज तीन महीने हो गए , अक्टूबर से दिसम्बर और अब तो जनवरी भी अपने बुढ़ापे में खड़ी है और मै अपनी बेटी को छू नहीं पाया हूं।
इन पहाड़ों के बीच ,इन सर्द रातों में अकेले पड़े पड़े अपने जीवन के उन अमूल्य क्षणों को समर्पित कर रहा हूं इस देश के निमित्त जबकि इसकी सबसे ज्यादा जरूरत मेरी बेटी और मेरी पत्नी को है ।
इन पहाड़ों पे पड़े पड़े अपनी बेटी का बचपन खर्च होते हुए महसूस कर पा रहा हूं लेकिन देख नहीं पा रहा हूं ।
ईश्वर से प्रार्थना यही है कि किसी को भी अपने जीवन में ये फौज की नौकरी न करनी पड़े क्योंकि आप अकेले कुर्बानी नहीं देते आपके साथ निरर्थक ही घोट दी जाती है एक लाचार पत्नी की कोमल कल्पनाएं और एक बच्चे का बचपन बिना उसके पिता के होकर भी न होने के अहसास के साथ।
आज जब पत्नी ने ये कहा कि एक सपना देखा है मैने जिसमें हम दोनों पति पत्नी और हमारा नन्हा सा बच्चा एक साथ इस सर्द रात में सुकून की नींद ले रहा है ,अचानक से जैसे एक हक सी उठी इस हृदय में ,
हाय! जो तुच्छ सी खुशी जो सहज ही उपलब्ध है हर किसी को जिसमें वो अपने परिवार के साथ समय बिता पाता है वो भी मै अपने परिवार को नहीं दे सकता मन क्षुब्ध सा हो गया ,और कसैला जिसमें करीब से झांकने पर पाया कि वो देशभक्ति जो हृदय में हिलोरें मारती थी पता नहीं कहीं लुप्त सी हो गई है।
किसी असहाय की सी मूरत को मेरे कारण इतनी कुर्बानी देते हुए देखकर एक अपराध बोध से ग्रस्त हो गया है मन , एक बच्चे को जब उसकी मां दिलासा देते हुए कहती है बुलाओ पापा को बेटा तब उस शब्द के पीछे चुप उस बेबस पत्नी का दर्द मै आसानी से पढ़ पा लेता हूं ।
कुर्बानी सिर्फ मरना नहीं होता ,कुर्बानी होती है अपने इच्छाओं की ,अपने भावनाओं की ,अपने अपनों की चाहत की ,जिस दिसंबर और जनवरी की रात में तुम अपने कंबल में लिपटकर परिवार के बीच बैठकर चाय की चुस्की का आनंद लेते हो न हम घर से हजारों किलोमीटर दूर बैठकर माइनस 30 में अपनी हड्डियां गला रहे होते हैं।
भाई लेकिन आज सच कहता हूं ,भर गया दिल कुर्बानी देते देते ,तुम सच में बहुत अच्छे हो कि घर में रह पा रहे हो ,हम तो अपनी के साथ साथ अपनों की इच्छाएं की भी हत्या कर रहे हैं ।
इतनी पीड़ा को सहने के लिए भगवान ने जितनी सामर्थ्य दी है उसके लिए धन्यवाद ज्ञापन और साथ में खुद के लिए और परिवार के लिए और ज्यादा धैर्य और हौसलों की आकांक्षा।
पर दिल में एक बात तो घर कर गई है ,अपनी बेटी को तो किसी वर्दी के संग नहीं करूंगा, नहीं चाहिए ऐसी जिंदगी जिसमें की जीवन के सारे अरमानों की तिलांजलि देनी पड़े ।
माफ करना मै तुम दोनों के साथ नहीं हूं ।
सत्यम।
निश्चित रूप से आपकी भावना युक्त यह लेख प्रशंसनीय है लेकिन यहाँ यह भी कहना प्रासंगिक है की आपके देश सेवा के कारण ही कई बेटियाँ आज अपने घरों में सुरक्षित एवं सहज हैं क्यूँ कि उन्हें पता है की आप जैसा कर्तव्य परायण पिता, चाचा और भाई उनके लिए सरहदे हिन्द की रखवाली में मुस्तैद है | आपका यह जीवन केवल आपके लिए नहीं है बल्कि आप पूरे देश के लिए समर्पित है और यह अवसर बहुत कम लोगों को ही प्राप्त होता है | निश्चित रूप से आपकी पुत्री जब बड़ी होगी और उसको पता होगा कि उसके पिता उसके बचपन में उनको छोड़कर सरहदे हिन्द पर गए तब उसको दुख नहीं बल्कि हिमपति के तुल्य गर्व की अनुभूति होगी और यह उनके लिए प्रेरणा का काम करेगी | आप का जीवन शिवत्व के लिए है और आपको अपने कर्तव्य, जन्म तथा अपने कर्म पर गर्व होना चाहिए | जय हिन्द ||
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