आव हो जगदम्बा।
रोगानशेषानपहंसि तुष्टा रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान् । त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति।।
आदिशक्ति अर्थात मूल में निवास करने वाली , शप्तशति में लिखते भी हैं "मूलाधार निवासिनी इह पर सिद्धि प्रदे"जगतजननी मां जगदम्बा, जगतकल्याण के निमित्त जिनका देवताओं के तेज से प्रादुर्भाव हुआ ,जो पूरी पृथ्वी को अपनी मातृसत्ता से आच्छादित करती हैं ,जिनकी दस दस भुजाएं,महादेव के तेजोस्वरूप जो त्रिनेत्र को धारण करती हैं उन महादेवी को मैं प्रणाम करता हूं ।जो रोग और शोक का नाश करने वालीं है जिनके शरण में गया मनुष्य कभी भी विपन्नता को नही प्राप्त होता है उन महादेवी को मैं नमस्कार करता हूं।
बहुत सारे त्योहार हैं भारत में ,सबके अपने अपने उद्गार हैं लेकिन दशहरा एक ऐसा त्योहार हैं जो अपने आप में जीवन के विशुद्धिकरण का कारगर तरीका है। जहां की मां को सबसे सुगम माना जाता है और इसी कारण मातृसत्ता को हमेशा निस्वार्थ भाव से सेवा करने वाला माना गया है चाहे आप उसके एवज में उसके लिए कुछ प्रयत्न करते हैं भी या नहीं।
माताओं को दरकिनार करके तथा उनको सबसे आसानी से उपलब्ध मानकर जो दृष्टिकोण मानव जाति ने मनाया है उसी को तोड़ने का एक अवसर होता है ये दुर्गापूजा जिसमे आप किसी व्यक्तिगत प्राणिमात्र की आराधना नही करते बल्कि पूरी सृष्टि की मातृशक्ति को साक्षी मानकर एक सार्वभौमिक इकाई की आराधना करते हो।
मैने महसूस किया है तुम्हे मां, मैं। नही जानता क्यूं हमेशा मैं इस समय तुम्हारे करीब खींचने लगता हूं ,जहां पर सभी उत्सव में प्रणत होते हैं मैं तुम्हारे आगे नतमस्तक होता हूं,भले वो मृणमयी होती है लेकिन मैने तुम्हे अपने काफी पास महसूस किया है उतने की पास जितना हम किसी सजीव देहधारी के अपने इर्दगिर्द होने पर करते है।
जब आश्विन शुक्ल प्रतिप्रदा को तुम अपनी पायल छनकाती हुई मन मंदिर में प्रवेश करती हो न उसी समय से तुम्हारी सुगंध को मैंने अपने नथुनों में महसूस किया है,हालांकि उपस्थिति उतनी तीव्र नहीं होती फिर भी तुम जता हीं देती हो की तुम हो यहीं कही आस पास....
मां मैने तुम्हारी आंखे देखी हैं एक चमक से परिपूर्ण जब तुम सप्तमी को अपनी पूरी भाव भंगिमाओं के साथ अवतरित होती हो, इस क्षण जब मैं तुम्हे वर्णित कर रहा हूं मेरे नेत्र सजल हो उठे हैं,पूरा शरीर रोमांचित हो उठा है गला रूंध सा गया है,मैं हमेशा तुम्हे अपने इतने ही करीब पाता हूं ,जब भी अपने कदम तेरे अनुग्रह हेतु तेरी और बढ़ाएं हैं।
...... हां तो जब तुम अपनी पूरी भाव भंगिमाओं के साथ उस मृणमूर्ति में सजीव हो उठती हो तब सारे रोम मेरे एक अदृश्य शक्ति को महसूस करके रोमांच में पड़ जाते हैं,
मां मैं साक्षी बना हूं अपने छिछले ज्ञान से ,तुम्हारे सजीव होने का, मैने जितने भी मंत्र पढ़े उन सबमें सिर्फ तुम्हारी कृपा से मुझे तुम्हारी अनुभूति मिली। मैने तुम्हारी आंखों को सजीव होते हुए देखा हैं....तुम्हारे अधरों पर फैलती वो स्मित देखी है।
मुझे याद हैं मां महानिशा पूजा के समय कुष्मांड बलि अर्पण करते वक्त काली काली के उच्चारण के साथ ही मेरा गला रूंध गया था,आंखो से आंसू बह निकले थे और भय मिश्रित हर्ष से पूरा शरीर कम्पायमान हो गया था,फिर कैसे मान लूं की मैने बस एक चर्या के अंतर्गत पूजा का विधान किया जबकि यह एक साक्षात्कार था मेरा तुम्हारे उपस्थिति के साथ।
मैने देखी है तुम्हारी सजल होती आंखे तुमरे विसर्जन के समय ,जैसे बस आंसू अब तैर चले हों, पलको से ढुलककर गालों पर एक पदचिन्ह छोड़ते गए हों,और यही वो पल होता है जब तुम अस्तगामी सूर्य की लालिमा के बीच जल की अतल में विश्राम करने को उद्धत होती हो की मेरे सब्र का बांध टूट जाता है फिर आंखे विकल मन से अश्रुधाराओं का विमोचन करने लगती हैं।
फूट फुटकर रोना, तुम्हारी विदाई के समय मेरी नियति बन चुकी है....
और जब तुम सारे नेह के नाते तोड़कर सुतल में विश्राम करने चली जाती हो तभी से प्रारंभ हो जाता है मेरा इंतजार अगली बार तुमसे मिलने का ....
प्रणाम मां
Wooww
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