एक नवरात्रि ऐसी भी।
दुर्गा पूजा नजदीक आ रहा था ,इस बार मन थोड़ा चंचल हो रहा था क्योंकि छुट्टी नवरात्रि के प्रारंभ में ही मिल जाने की आशा थी ,पर फिर भी सेना के संस्कृति को अमल करते हुए अंत समय तक अनिश्चितता बनी रही ,वो एक शायद वाला भाव सेना का एक अभिन्न हिस्सा है
बरहाल मनौतियों और उम्मीदों के बीच में हमने यात्रा सुनिश्चित कर ली।
हर बार से भिन्न इस बार दर्शक न होकर साधक की भूमिका प्रारंभ की,बस एक ही उम्मीद के साथ की उस परम शक्ति के साथ तारतम्य जुड़ जाए और एक क्षणिक झलक अन्तस्तल को छू जाए, वैसे भी पूरे दस दिनों में एक या दो साक्षात्कार का अहसास ही हो पाता है वो भी बस क्षणिक।
खैर साधना प्रारंभ हुई, भगवती की छवि को सहेजा और अपने को उस पराशक्ति के समीप खींचा ,
हाथ जुड़ गए बिल्कुल सिर के ऊपर और तारसप्तक में..
खड्गम चक्र गदा.....
एक क्षणिक रोमांच सारे शरीर में व्याप्त पर तुरंत गायब ,बस रोमहर्षश जायते,जब तक उसको समझ पाता गायब,
कोई भी जैसी तेरी इच्छा जगदम्बा ।
अगले सात दिनों तक कोई एहसास नहीं ,बस यंत्रवत विधान करता रहा ,कोई दैवीय अनुभव नहीं बहुत बार बैठ जबरदस्ती खुद को धकेलना चाहा उस ऊर्जा के पास पर कुछ नहीं बिल्कुल खोखला ,सब खाली ... जैसे तारतम्य ही टूट गया हो कोई जुड़ाव नहीं ,मन अवसादित भी नहीं हो पाता ,छह कर भी रोना नहीं आ रहा की क्यूं इतनी रुष्टता ,इतनी निर्दयता वो भी माता होकर , बहुत बार याद दिलाना चाहा तुम्हे की कुपुत्रो जायेत लेकिन तुम्हे कोई मतलब नहीं था।
प्रतिदिन किया गया तुमसे वो संवाद जिसमें मैने सब कुछ स्वीकारा, अपनी नाकामी ,तुमसे दूर होकर भी विकल न होना, अपने विचारों की अशुद्धता, इन संवादों के भी शुद्ध होने पर मुझे संदेह था उसे भी तुम्हें निवेदित किया लेकिन बड़ी निष्ठुरता से तुमने सब नकार दिया ।
अम्बा !
रात में सोचा एकांत में बैठकर तुमसे संवाद किया जाए लेकिन वो सब व्यर्थ सब कुछ स्वीकार करने से जब मन कर दिया तुमने और फिर भी जब मन विकल नहीं हुआ तो मैने अपने विचारों की अशुद्धता स्वीकार की ,मना लिया खुद को नहीं की मै कोई साधक नहीं जिसमें तुम्हे खींच लाने की क्षमता हो ,न ही एक अच्छा बेटा जिसमें म से दूर जाने पर व्यग्रता का भाव आए, कलुषित और भटका हृदय पर जो साधना में कर रहा था ,जो व्रत के नियम थे उसमें मै अडिग रहा ,मैने तुमसे निवेदित किया था ,मन किया सब मिथ्या है ,पूजा मिथ्या ,भाव निम्न लेकिन जो सामाजिक नियम का ज्ञान था उसमें मै अविरत था बस वही एक संतोष लेकर मैने सबकुछ तुमपे छोड़ दिया...
।।त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पये।।
फिर तुम्हारा आगमन हुआ सप्तमी को ,तुम्हारी प्राण प्रतिष्ठा के बाद तुम्हारी आंखों को देखकर एक बार मन आह्लादित हुआ ,हृदय का उद्वेग आंखों में हल्का सा उभरा फिर तुरंत यंत्रवत हो गया मैं ।
कोई नहीं माता ये भी स्वीकार है मुझे जब तक तुम्हारा स्पर्श नहीं होगा न तो उद्वेग आकंठ आएगा न आंखों में आंसू तैरेंगे ।
सब पूरा हो गया ,नवमी की तिथि आ गई ,तुम्हारे निमित्त हवन भी संपन्न हो गया था ,मैने उम्मीद छोड़ दी थी। तुम्हारे स्पर्श की अभिलाषा दम तोड़ रही थी मैने भी सोचा चलो इस बार यंत्रवत ही सही ।
क्षमा प्रार्थना ,सबसे अंतिम पहलू,जिसके बाद मुझे तुम्हारे समक्ष आने के लिए एक साल का इंतेज़ार करना होता या शायद उससे भी ज्यादा क्योंकि ये मेरे हाथ में नही,
...
न मंत्रम नो यन्त्रम.......
कंठ अवरुद्ध सा होने लगा ...
आवाज तो पहले ही जा चुकी थी अब सांसे भी उखड़ने लग पड़ी ...
तदपि न जाने स्तुतिमहो.....
हिचकियां बेहिसाब फुटने लग पड़ी ,उसे रोकने के असफल प्रयास में पूरा शरीर हिलने लग पड़ा .. पीछे खड़े सारे लोग न समझ पाएं उसकी पूरी कोशिश....
न चह्वाणं ध्यानं,
तदपि न जाने स्तुतिकथा…..
बताओ मां ये तुमने अच्छा नहीं किया न ,पूरे 9 दिन में तेरे सामने बैठा रहा तुमने पलकें भी न फेरी ,कितना नजरअंदाज किया मुझे और मैं भी बेवकूफ रो भी न पाया ,जिद भी न मचा पाया कि तू क्यों मेजों इसे कर रही ,मैने अपने शैशव को समावेशित भी कर पाया भी तो तू न आती ऐसा हो ही नहीं सकता था लेकिन मैं भी बड़ा समझदार बने रहने का ढोंग करता रहा ,अब बताओ कल से तुम चली जाओगी तो आज दुलार दिखा रही ,... जाओ मैं तुमसे बात नहीं करता ,नहीं करूंगा बिल्कुल भी ....
अश्रु धारा......
क्यों ? आखिर क्यों ?
आज क्यों अब तक क्यों नहीं .....
न जाने मुद्रास्ते.
तदपि न जाने विलपनं.....
बस कंठ रुक गया , हिचकियों के सैलाब ने सारे शब्द निगल लिए ,कौन क्या देख रहा क्या सोच रहा सब गौण,कुछ नहीं कोई नहीं ,बस मैं और मेरे सामने तुम .....
कल से ये नेह फिर नहीं मिलेगा सिर्फ। हिचकियां और आंसू ,शरीर पत्ते की तरह हिल रहा लेकिन हृदय गदगद ।
पर ये ठीक नहीं है न मां, अगली बार से कृपा पहले दिन से चाहिए ।
विदा माते।
प्रतीक्षा में ....
अनवरत.....
सत्यम....
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