पर पीड़क

ऐसा नहीं है कि हमेशा से मेरा बारिश को देखकर ,उसमें भीगने का मन किया हो या फिर हमेशा एक जैसे ही ख्याल।आएं हों।बचपन से जवानी और फिर एक जिम्मेदार इंसान बनने तक में बारिश के बहुत सारे ख्याल आते जाते रहे हैं ।
वो टीन के शेड में लगी हुई चारपाई पर लेटकर जिसके दोनों मुहाने खुले होते थे जिसमें की आप पतली पतली जलधाराएं एक कृत्रिम झरना का मजा देती थी ,का आनंद लेना ,बारिश की थाप तीन शेड पर अनवरत पड़ते पड़ते एक संगीत का रूप ले लेती थी और हम खुद को लिहाफ में लपेटकर खुद को पूरी तरह से सुरक्षित सुनिश्चित करके बस अपनी आंखों आंखों को बाहर का नजारा देखने के लिए खुली रखते थे।

एक ख्याल आता था उस समय का जिसको विशेषकर उद्धृत करना जरूरी हो जाता है ,
मुझे ऐसा लगता था कि रात के अंधेरे में बारिश में निकलना कतई आनंददायक नहीं हो सकता उसपर से जब आपने ठंड भी लग रही हो तो खुद के हाथ पांव को पूरी तरह समेटकर ही लिहाफ में गर्म रखना झा बारिश के छींटे भी आपको भीगा नहीं सकते ,एक तरह से बारिश को चिढ़ाना और ललकारना हो जाता है ,की है हिम्मत तो आ जाओ ,क्या ही कर लोगे मेरा ,इन सबके बीच एक खुराफात चलती थी कि किसी को भीगना देखना इन सबों के बीच कितना आनंददायक हो सकता है ,इसे एक तरह से मैने परपीड़क की संज्ञा देता हूं क्योंकि ये कहीं से अच्छी भावना नहीं को जा सकती लेकिन हां ये थी ,तोआई एक चुंबक को रस्सी से बांधकर उसके एक सिरे को अपने हाथ में इस तरह से पकड़ता था कि मेरा हाथ तनिक भी सुरक्षा कवच से बाहर न झांकने पाए और मै चुंबक को बारिश में फेंक देता था ,फिर एक ख्याली पुलाव बनाता रहता था कि कैसे वो चुंबक भीग रहा होगा और मैं कितने आनंद में हूं जहां बारिश का तनिक भी असर नहीं हो था है ।

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