रेखाचित्र

बहुत सोचा कि कहां से शुरू करूं ,कोई मानदंड स्थापित ही नहीं हो था था ,फिर सोचा शुरू करते हैं अपने भीतर के लेखक को झंझोड़ा जाए कि भाई उठ जाओ,एकाकी मन का तुमसे बेहतर साथी कोई नहीं है,तुम भी सुषुप्त हो गए तो फिर जीवन का सार कहां संचित किया जाएगा ।

अपने इस लेखन के अतीत में झांकता हूं तो पाता हूं कितने हीं मोड आकर चले गए ,उम्र काफी आगे निकल आई और अवचेतन मन में काफी बदलाव आ गए जो मानसिक स्तर पर संबल देते नजर आए ।

जैसे लगता है कल की ही बात है, चौथी कक्षा का एक लड़का भगवान शिव को साक्षी मानकर अपनी पहली रचना समर्पित करता है, क्या ही शब्द का कोई गूढ़ अर्थ होता उस बालमन में फिर भी प्रारंभ तो हो ही चुका था।

इसके बाद कहानियों की छत ने मानसिक सोच को बहुत समृद्ध किया ,भावों को शब्दों में समायोजित करने की शक्ति और उसे पन्नों पर उकेरने की प्रक्रिया चलती रही।

तरुनाई के आगाज के साथ प्रेम के विचारों ने जिंदगी में दस्तक दी तथा अकथित,अव्यक्त प्रेम ने हृदय में विचारों का तूफान खड़ा कर दिया, प्रेम के अंकुरित होने के साथ ही विक्षोभ के गीत लिखे जाने लगे ,भाव पंक्तियों , गद्य-पद्य और शायरी बनकर पन्नों पर उकेरने लगे ,अभी भी याद है कि एक प्रेम पर लिखी कविता को दसवीं कक्षा में दोस्तों ने जोर- जोर से पढ़ा था ताकि  प्रेम सार्वजनिक हो जाए।

विचारों के समृद्ध तथा मानस के परिपक्व होने के क्रम में वैराग्य,जीवन, विस्मृत बालपन,प्रकृति अनेक विषयों पर विचार शब्द बनकर उकरे।एक पाठक के रूप में भी कहीं प्रेमचंद ने रुलाया कहीं हसाया ।

एकांत में कितनी रातें ऐसी गुजरी होंगी जब मैने अपने इन कागजातों को देखते हुए , स्वलिखित पन्नों को पढ़ते हुए मैने खुद को अतीत में जाकर टटोला ,उसके भींगे आंसू पोछे और आश्वस्त किया कि भविष्य में ये विषय इतने दारुण नहीं लगेंगे जितना अभी प्रतीत होते हैं।

अपनी प्रेमिका की तरह?

नहीं प्रेमिका नहीं अपने बच्चे की तरह मैने हरेक पीले पड़ चुके पन्ने को संवारा ताकि किस भी उम्र की दहलीज पर मैं समय यात्रा कर सकूं और अपने उसी स्वरूप से मिल सकूं और अपनी अतीत की व्याकुलता पर अनुभवों का चश्मा लगकर मुस्कुरा सकूं।

मुस्कुरा सकूं उन तमाम बचकानी बातों को याद करके जो तब इतनी महत्व की लगती थी, 

एक मुस्कुराहट अपने उस बचपन के चप्पलों को खोने की घटना को याद करके जिसके बाद सिर्फ बिना चप्पलों के घर जाने का ध्यान भर से चप्पलों से पीटे जाने के ख्याल ने रुलाया था।

अब तक कितनी ही अजीज चीजें खो चूकने के बाद  मन आसानी से समझ जाता है ,विद्रोह नहीं करता क्योंकि ये कहीं न कहीं जानता है जीवन किसी योजना के तहत हमेशा काम नहीं करता ,अप्रत्याशित हमेशा की विद्यमान है।

हे ईश्वर ,मानसिक शक्ति हमेशा प्रदत रखना जिससे कि जीवन का वर्तमान नीरस होने पर भी अतीत कभी न कभी गुदगुदाता रहे ।

हे कृष्ण !

सत्यम l

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