विवाह

वैसे तो मैं विजातीय विवाह का विरोधी नहीं , हां कभी कभी समर्थन  भी कर देता हूं क्योंकि मुझे ऐसा लगता है कि जिन्होंने अपनी जिंदगी जीनी है उनका फैसला अगर हो तो उनके लिए श्रेयस्कर होगा।
जातिगत समीकरण में फंसकर अपने मन में कुंठा को दबाए रखने से जीवन कष्टकर हो जाए ये नई कतई नहीं चाहता ।
प्रेम विवाह का मैं विरोध नहीं करता अगर वो सामाजिक तरीके में बदला जाए ,वैसे सच कहा जाए तो मैं विरोध नहीं करता किसी भी प्रकार का क्योंकि मेरे विरोधाभास से किसी को क्या ही फर्क पड़ जाएगा ,चाहे वो अंतर्जातीय विवाह हो या प्रेम विवाह हो।
कुछ समय पहले मैने एक पाण्डेय परिवार की लड़की का फेसबुक  पोस्ट देखा ,हालांकि  उन्होंने अंतरजातीय विवाह के बाद भी अपना सरनेम पाण्डेय ही रखा है ,मुझे इसमें भी कोई आपत्ति नहीं है ,आप जिस कुलीनता में पैदा हुए आपको पूरा अधिकार है उसका निर्वहन करने का लेकिन जिस प्रकार से स्त्रियां अपना सरनेम विवाह के पश्चात बड़े शौक से बदल लेती हैं ,मुझे यहां पर अपने अतीत से चिपके रहने की ललक महसूस हुई।
मैं ब्राम्हणों की गौरव गाथा नहीं गाऊंगा ,ये नहीं कहूंगा कि ब्राह्मण सर्वोपरि है ,जातिगत व्यवस्था हमारे धर्मग्रंथों में कहीं उल्लिखित नहीं है ,मैं भी वर्ण व्यवस्था को ही प्रमाणित मानता हूं ,लेकिन कर्म निर्धारित वर्ण व्यवस्था का निर्वहन आज के परिप्रेक्ष्य में बहुत हद तक जातिगत ही रही है इसको मानने में लोगों को परेशानी नहीं होनी चाहिए,अन्यथा कोई भी जाती विजातीय विवाह को सामाजिक अड़चन न मानती चाहे वो कुलीन से कुलीन या सामाजिक दृष्टि से हेय माने जाने वाला हो।
हां तो उस पोस्ट को देखकर यूं ही मुझे उत्कंठा हुई कि इसको किन किन लोगों ने अनदेखा किया और किन्होंने उसे पसंद किया ,
अर्धशतक तक भी भी सूची को देखने के बाद मुझे उसमें पाण्डेय सरनेम वाले बहुत कम लोग दिखे, बस लड़के के पक्ष के ही लोग थे जिन्होंने अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई थी।अचानक मन एक सोच से अधिकृत हो गया कि हम सोशल साइट्स पर अपनी उपस्थिति क्यों दर्ज करवाते हैं, ताकि हमें जानने वाले हमें ये एहसास दिला सकें कि हम  तुम्हारे जीवन में चल रही हलचल को जान रहे हैं और हम एक दूसरे से जुड़े हुए हैं।
क्या उस लड़की में मन में ये ख्याल नहीं आता होगा कि जिस परिवार में वह पली बड़ी आज उसका एक भी सदस्य उसके अस्तित्व को भी स्वीकार करने को तैयार नहीं ।
क्या उसका मन क्षुब्ध नहीं होता होगा ,क्या उसका हृदय उसके अपनो से, अपने अतीत की ,बालपन की मधुर स्मृतियों से जुड़ने को लालायित नहीं होता होगा, जब वो इतने अरमानों से अपनी उपस्थिति दर्ज करवाती होगी और उपेक्षित होती होगी तो उस शूल के दंश को संभालने में उसे कितना कष्ट होता होगा।
हो सकता है उसे जरूरत नहीं महसूस हुई होगी उस समय,जब उसमें ये कदम लिया होगा लेकिन मेरे विचार से,क्या इस जरूरत ने समय के साथ विशालकाय रूप नहीं ले लिया होगा। परिवार का एक तबका जीते जी छूट जाना कोई साधारण बात तो नहीं 
भगवान न करे उसकी इच्छा शक्ति कभी कमजोर पड़े और वो वापस अपने दुआर की तरफ उन्मुख हो अन्यथा विषमय वाणी और ठोकरों के सिवा यहां क्या रखा है।
लेकिन दूसरा पक्ष ये भी है कि परिवार क्या करे ,अकेला चना भांड नहीं फोड़ता, ऊपर से आपने उसे समझा भी नहीं , उस परिवार से पूछने की जरूरत नहीं समझी ,जिस प्रकार आपने उसे उपेक्षित किया ,तमाम लोगों की कटाक्ष भारी निगाहों का जिस प्रकार से उस परिवार ने सामना किया ,अगर आज वो आपसे विस्मृत है तो आश्चर्य कैसा।
इस दोनों पक्षों की संवेदना और दुश्चिंताओं को देखते हुए मैं इस दुविधा में हूं कि निष्कर्ष क्या निकाला जाए 
दोनों ही क्षुब्ध हैं,दोनों ही प्रताड़ित ,दोनों को ही परिवार खोने का दंश एक समान है , किसे उत्पीड़क कहें,किसे उत्पीड़ित समझ नहीं आता।
इसी भंवर में  सामाजिक संरचना से हतोत्साहित एक प्राणी....
 सत्यम....

टिप्पणियाँ

  1. अत्यंत सुंदर टिप्पणी | आजकल इस प्रकार गंदा प्रचलन चल पड़ा है जिसको कुछ तथाकथित बड़े लोग भी बढ़ावा देने में लगे हुए हैं | उनको ऐसा करके बहुत आनंद मिलता है और एक एहसास दिलाने की कोशिश करते हैं की हमलोग मॉडर्न हैं और जनशक्ति की सहमति भी उन्हें प्राप्त है | मुझे तो यही लगता है की इस विषय पर किसी भी प्रकार की चर्चा बेकार है ज़रूरत है की इस आग से कैसे बचा जा सके जो दावानल का रूप ले रही है |

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