विश्रांति

अजीब सी उलझन थी उसके मन में ,उसे अपनाता तो  आत्मसम्मान बार बार कुचला जाता न अपनाता तो उसका सुकून उससे कोसों दूर था, ऐसा नहीं था की उसे इस बात का इल्म नहीं था की उसे क्या सिखाया जा रहा है ,उसे बिना कहे क्या संदेश दिया जा रहा है फिर भी अजीब सा पागल था वो ,उसके दिलो दिमाग से  वो हटती ही नहीं थी।
क्या क्या नही किया उसने ,रातों की नींद कुर्बान कर सुबह जलती आंखे लेकर काम पर गया था ,उसके लिए बर्फ के शीतलहर से लेकर उमस भरी रातों को झेला  हालांकि ये सब बताना ही खुद में एक ओछापन लगता था उसे फिर भी वो कहते हैं ना की अतीत बार बार आकर सवाल करता था कहा गया तुम्हारा प्यार जिसके लिए तुमने बाकी सब को ठोकर मार दी थी, कहा था की सो जाओ तो तुमने सबकुछ छोड़कर उसको चुना और अब जब उसने तुम्हे छोड़कर किसी और को चुन लिया तो उसमे आश्चर्य की बात ही क्या है।
उसे उसका भूतकाल आकार जैसे चिढ़ाता था बहुत घमंड था न उसके ऊपर अब बताता हूं।
सबके सब को तो उसने अपना विद्रोही बना लिया था सिर्फ उसके लिए और आज जब वो भी विद्रोह पर उतर आई थी तब एक भी कोना नही मिल रहा था उसे जो उसे दिलासा दे सके मैं हूं तेरे लिए ।
अजीब विडंबना थी,
 उसको खुद को पाने लिए उसे छोड़ना जरूरी हो गया था और वो था की बार बार कुचल दिये जाने पर भी उसी को अपनी सदाओं में मांगता रहता ।
प्रेम तो नही था उसे इतना तो वो समझ गया था ,और क्यों न समझता उसने उसी से तो प्रेम किया था और इश्क का रंग उसपे कैसा चढ़ता है उसे बखूबी मालूम था तो ये जो भी हो प्रेम तो नही था ,बस वो उसे ढो रही थी की मैं क्यों मना करूं जब बिना मना किए हीं वो स्वतंत्र जीवन जिसमे उसके लिए कोई स्थान नहीं था, जी रही थी ।

भाई जा न यार अपनी पूरी ऐसी तैसी करवा कर ही जाएगा क्या ,तेरा कोई आत्मसम्मान नही है क्या ,तुझे ये नही पता की जो तुझे प्यार करेगी वो कभी तेरे आत्मसम्मान  को कभी नही कम होने देगी और यहां तो तुम्हे तनिक भी नही मिलता ,वो जो भी अच्छा महसूस करते हो वो अतीत था ,अब है नहीं ,तो बढ़ो यार कोई और ढूंढो ,कहीं और तलाश करो खुद को ,खुद की खुशियों को ऐसा नहीं है न की उसे कोई समझने वाला मिला गया तो तुम्हे कोई नही मिलेगा। तुमने ही तो उसे इतना विशिष्ट बनाया है तो उसे निकृष्ट भी बना सकते हो न ,जो नही रहना चाहता उसे क्यों पकड़े रहना चाहते हो  जाने दो तुम मरोगे नही इस बात की गारंटी मैं लेता हूं ।
तुमने बहुत किया तो क्या ...
तुम बहुत रोए तो क्या ...
तुम्हारा कलेजा बाहर आ जाता है तो तुम ना समझो...
तुम्हारा आत्मसम्मान है तुम देखो अपना ...

इसीलिए बोलता था भाई सो जाओ ,
अपनी ऊर्जा अपने इमोशंस मत करो बर्बाद ,ये दुनिया बहुत मतलबी है यहां कोई फर्क नहीं पड़ता किसी को तुम्हारे होने न होने से तो अपना मानसिक और आत्मिक नियंत्रण अपने ही पास रखना था तुमको लेकिन तब तुम नही माने ,अब फिर से मेरे पास आते हो बचा लो मैं टूट रहा हूं तो मैं क्या करूं ।

फिर भी मुझे तो कुछ करना ही पड़ेगा लेकिन क्या तुम।मेरे साथ दोगे ,तुम नही न पीछे हटोगे ,कमजोर तो नही ना पड़ जाओगे मित्र ।
तुमसे महत्वपूर्ण कोई नही है 
और जो तुम्हारी इज्जत नहीं कर सकता वो तुमसे प्रेम क्या खाक करेगा ।
चलो भाई चलें यहां से,
यहां अपना कोई नही है ।
सब रिश्तों की  अपनी अपनी जरूरतें है 
किसी की शारीरिक किसी की मानसिक 
और आप जब किसी के सामने इतनी जरूरतें लेकर जाते हैं तो आप भिखारी हैं और भाई ....

भिखारी दया के पात्र होते हैं प्रेम के नही .....

सत्यम..

टिप्पणियाँ

लोकप्रिय पोस्ट