यायावर
कोई रोचक कहानी तो नही सुनने वाला हूं ना ही कोई जादूगर यहां सीसे से कबूतर निकालने वाला है,बस एक यात्रा के संस्मरण लिखने का प्रयास कर रहा हूं जिसमे भारत की सीमारेखा से सटे सुदूर अनजाने प्रांत में अपनत्व के एहसास का रोमांचकारी अनुभव है।
हुआ ये की एक एक्सपीडिशन के दौरान पश्चिमी प्रांत के अंतिम छोर पर जाना हुआ ,राजस्थान का निर्जन स्वरूप आसानी से दृष्टिगोचर हो जाता है वहां जहा गांव के नाम पर कुछ घर एक दूसरे से काफी दूरी पर बिखरे हुए मिलते हैं , आमजन की भाषा में इनको ढाणी कहा जाता हैl
हमने एक अपने रुचि की एक जगह ढूंढनी थी जहां पर हम अपना सेटअप कर सकें ,घूमते हुए हमने एक बालू टिब्बे को चिन्हित किया जिसके ऊपर एक परिसर बना हुआ था ,जब हम वहां पहुंचे तो वहां उस पास की ढाणी के दो वृद्ध जिनमे एक उसी परिसर का व्यवस्था का कार्यभार भी संभालते थे,पुराने कपड़ों की रस्सियां बना रहे थे, ये बहुत की ग्रामीण संस्कृति है भारत की जहां गांवों में मंदिर ,पंचायत भवन या कोई भी पेड़ जो उस गांव का सामयिक धरोहर होता है वहां लोग अपने जीवन के उत्तरार्ध में तास खेलते,रस्सियां बांटते,या गप्पे लड़ाते, गांव की समस्याएं, आजकल के बच्चो की तकरीरें ,देश और राजनीति की बातें करते,मिल जाएंगे ।
उम्र के इस पड़ाव पर स्थिरता आती है जिसमे व्यक्ति वस्तुनिष्ठ हो जाता है और एक व्यक्तिगत आलंबन से ज्यादा समाज को तबाज्जो देने लगता है।
हमने जाकर राम राम की,उन्होंने भी हमें आगंतुक की आवभगत के साथ तुरंत ही पारिवारिक माहौल में अपना लिया ,लगा ही नहीं एक भी क्षण को की हम अपने गांव घर से सैंकड़ों किलोमीटर दूर किसी अजनबी शहर में आए हैंl
वैसे हम फौजियों को देश का कोई भी कोना अपना ही लगता है ,फौज में दिया गया प्रशिक्षण का एक हिस्सा ये भी होता है हम हजारों फीट की ऊंचाई पर हड्डियां गलाने वाली ठंड और त्वचा को झुलसा देने वाली गर्मी दोनो को ही गले लगाते हैं।
भारत का भौगोलिक हरेक हिस्से पर अनायास ही हम अपना मालिकाना हक समझने लगते हैं लेकिन तब हम अपने कर्तव्य पथ पर होते हैं ,वैसे देख जाए तो एक फौजी हमेशा ही वस्तुनिष्ठ हो जाता है चाहे वो व्यक्त करे या नहीं लेकिन खुद ही उस राष्ट्र के विस्तृत व्योम में विचरण कर रहा होता है।
वैसे मिट्टी के साथ अपना रिश्ता होने पर भी एक मानव शरीर में रहने के कारण मानव के साथ हमारा प्रेम हमेशा अपेक्षित रहता है, आपको अगर इस रेगिस्तान वाले इलाके में मानवीय प्रेम का भी रसास्वादन हो जाए तो क्या कहने।
हमारे पूरे समय तक वो हमसे बातें करते रहे,हमारा गांव हमारा आने,खाने की चर्चा की जिसमे एक अभिभावक जैसी चिंता समाहित थी।
सच में अगर पूरे भारतवर्ष में व्यक्ति एक दूसरे को इतने ही स्नेह और प्यार से व्यवहार करते तो अनायास ही भारत का एक राष्ट्र ,जो की एक जीता जागता पुरुष है ,की अवधारणा सजीव हो जाएगी ,वसुधैव कुटुंबकम् चरितार्थ हो जाएगा जिसमे की हम बिना विशेष सक्रिय हुए सहज ही सबके लिए सहज उपलब्ध हो जाए।
उन्होंने हमारे लिए चाय बनाई ,वैसे भी मैं चाय का कभी शौकीन नही रहा हूं फिर भी उस प्रेम और सत्कार को न कहना मेरा दुर्भाग्य ही होता इसीलिए उनके बड़े प्रेम से छोटी छोटी छिपलियों में निकाली चाय को हमने बड़े चाव से पी।
वस्तुतः उस चाय के माध्यम से मैं ऐसा ही महसूस कर रहा था की मैं काफी दिन बाद अपने उस घर में आया हूं जहां मैंने अपना भूतकाल का समय बिताया हो, वो लोग मुझे अपने ही लोग दिखें जिनसे मैं काफी दिन बाद मिल रहा हूं।
मैंने पूछा उनसे उधर की कुछ और बातें जिसके उत्तर में उन्होंने कहा कि हैं जहाज उड़ते हैं यहां अपने वाले ही और अपने फौजी लोग भी आते हैं इधर ,अपने वाले शब्द में मैने देश के सुरक्षा तंत्र में आरोपित हरेक भारतीय आमजन का अडिग भरोसा और अटूट विश्वास महसूस किया।
धूप तेज हो रही थी और सुबह काफी जल्दी उठने के कारण थोड़ी ऊंघ सी आ रही थी। मैने और मेरे एक सहकर्मी मंदिर के चबूतरे पर बैठे थे जहां वो दोनो अपना काम कर रहे थे ,हम दोनो ने बैठे बैठे लेटने का उपक्रम किया और शरीर को निढाल करने लगे ,यह कहना अतिश्योक्ति बिलकुल नहीं होगी ,की हमारे सिर को जमीन पर पड़ने से पहले हम दोनो के सिर के नीचे उन्होंने एक एक तकिया लगा दिया था।कब वो उठे तकिया लाया और उसे हमारे सिर के पास लगा भी दिया ,सच कहीं तो हृदय में को आनंद की अनुभूति हुई वो इतने प्रयत्न के बाद भी पूरी तरह शब्दों में बंद नहीं पा रहा हूं ,मन में इस विवरण को आप सबसे बांटने की इच्छा प्रबल हो गई ।
हृदय ने मन को और मन ने मस्तिष्क को अपने घर में आरामदायक बिस्तर पर ही होने का एक संकेत भेजा और हम पूरी तरह समर्पित होकर बिना किसी नकारात्मक विचार के उस फर्श पर निढाल हो गए।
हमने आते समय उनको गिर से राम राम किया और एक स्वस्थ और आनंदमिश्रित अनुभूति अपने हृदय में समेटकर अगले निर्दिष्ट गंतव्य के लिए प्रस्थान कर गए ।
सत्यम
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