मैं क्यों लिखता हूं l
भरे पड़े हैं रचनाओं से ,बड़ी बड़ी अलमारियां ,बुकसेल्फ ,ठसाठस भरी है तमाम तरह की कहानियां फिर भी वो लिखना चाहता है ,वो लिखना चाहता है क्योंकि इतना लिखने के बाद भी लगता है बचा रह गया बहुत कुछ...
चाहे तुम कविता लिखो ,व्यथा से परिपूर्ण या तुम लिखो गोबर और झुनिया की प्रेम कथा ,तुम लिख डालो होरीराम की बेबसी को जो एक गाय को अपने दुरे पर बांधने की दिल की तमन्ना को दिल ही दिल में लेकर चला गया ,या फिर तुमने अपनी प्रेमिका के अक्स को चांद में ढूंढकर उसे शब्दों में जीवंत कर दिया , ऊसने भी चुना था तुम्हे लिखना ,बहुत सारे प्रेम कथाओं के जखीरे के होते हुए भी ये दुस्साहस किया था उसने ,क्योंकि उसे लगता था की उसके हृदय को पूरा नहीं लिखा गया ,उसने पढ़ा था उसकी लंबी चमकदार चोटियों को पर उससे उठती भीनी भीनी सुगंध को लिखना छूट गया था। उसने उसकी काले नयनों को पढा तो था पर उनसे मिले इंतजार को लिखना छूट गया था कहीं, उसने उन अधरों पर उठती उस मुस्कुराहट को शब्दों में ढूंढने की नाकाम कोशिश की थी ,उसे कुछ टुकड़े मिले तो थे लेकिन उसने पाया की यह उस मुस्कुराहट की साथ ज्यादती होगी इसीलिए उन सब बाक्यांशो को वह लिख देना चाहता था क्योंकि उसे लगता था की इसे नही लिखा गया तो काव्य अधूरा रह जाएगा ।
उसने पढ़ा है उसकी काली आंखों को लेकिन उसमे भरे इंतजार को पढ़ने की लालसा दबी रह गई थी...
उसने उन होठों की नर्माहट तो पढ़ी थी लेकिन अपने प्रेमी को देखकर उसपे आई कंपकपाहट को कहीं पढ़ा नहीं जा सका था ....
उसने पढ़ा था प्रेम की गहराइयों को लेकिन सामाजिक दायरों में दबकर रह गई उसकी घुटन को पढ़ने का इंतजार अनवरत जारी था...
शायद इसीलिए उसने कलम उठा ली थी ,वो लिख देना चाहता था अपनी उन सारे अनुभवों को जो उसे लगता था की शायद उससे ज्यादा और उससे बेहतर कोई जता ही नही सकता।
उसे लिखना था मां की आंखों को जो उसका बचपन सुनते हुए चमक उठती थी और अपने पिता का त्याग ।
उसे लिखना था अपने उस प्रेमिका की नर्म नर्म हथेलियों को जिनके स्पर्श मात्र से उसका हृदय पुलकित हो जाता था ...
उसे लिखना था उन दोस्तों की अक्खड़ बातें जो जीवन के एक मोड़ पर आकर विदा कह गए थे।
उसे लिखना था उन एक जोड़ी आंखों को जो सामने पड़ जाने पर नजरें चुराने लगती थींl
उसे लिखना था मां की आंखों को जो उसका बचपन सुनते हुए चमक उठती थी और अपने पिता का त्याग ।
उसे लिखना था अपने उस प्रेमिका की नर्म नर्म हथेलियों को जिनके स्पर्श मात्र से उसका हृदय पुलकित हो जाता था ...
उसे लिखना था उन दोस्तों की अक्खड़ बातें जो जीवन के एक मोड़ पर आकर विदा कह गए थे।
उसे लिखना था उन एक जोड़ी आंखों को जो सामने पड़ जाने पर नजरें चुराने लगती थींl
उसे लिखना था उन लंबी रातों को आंखों में पसरे उन ख्वावों को जिन्होंने अपने सुंदर भविष्य की रूपरेखा खींची थी ,उसे ये भी तो लिखना था की कैसे अकेली अंधेरी रात में घर की याद ने उसे बच्चे की तरह फुटफुटकर रुलाया थाl
उसे अपनी जिम्मेदारियों से घिरी हुई अपनी कुर्बानी लिखनी थी ,उसे लिखनी थी उन कोमल आंखों में छलकते हुए आंसुओं को जिन्होंने जीवन के एक निर्जीव क्षण में विदा मांगी थी ।
उसे लिखना था अपना वादा जो उसने कभी किसी से किया था की उसके अक्स को धूमिल नही होने देगा ,उसे लिखना था चिता पर राख होती हुई जिस्म को ,और उस उस उदगार को जो उन लपटों के साथ साथ हीं आकाश में उठते जा रहे थे
इतना कुछ दबा था उसके अंदर ,वो सब लिख देना चाहता था एक पन्ने पर ताकि वो स्वतंत्र हो सके। अपने उन जिम्मेदारियों से, मुक्त हो सके की अब सजग रहने की आवश्कता नही रह गई हैं क्योंकि सब कुछ सहेजा जा चुका हैं ,अब अगर मन कहीं डूब जाना भी चाह तो वो उसे छोड़ सकता है बिना किसी हिदायत के ।
कोई क्या ही लिखा पाएगा उन तमाम मनोवृतियों को, किसी ने जाना नहीं होगा ,किसी ने जाना होगा तो उससे अपने मन को सींचा नही होगा ,और वह इन अमूल्य जीवन निधियों को यूं ही व्यर्थ नहीं जाने दे सकता शायद इसीलिए ...
वो सब कुछ लिख देना चाहता है ,अपनी तरह से .....अपने शब्दों में ....
सत्यम्
बहुत उम्दा।
जवाब देंहटाएंThank you
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