तुम मुझे यूं भुला ना पाओगे...
आपको कभी जाने देना तो नही चाहता था ,ऐसा लगता था की आपसे एक अलग ही स्नेह है जो मैं और किसी से नहीं शेयर करता हूं , पता नही ऐसा क्यों था ,ऐसा वास्तव में प्रारंभ से था या घर वालों ने बार बार ऐसा जाता करके हम दोनो के मन में ये भावना भर दी थी।
आपको कभी तुम कहकर नही बुलाया ,हालांकि यह अवधारणा है की जिसको हम बहुत प्रेम करते हैं उसको तुम कहने लग जाते हैं लेकिन मेरे सापेक्ष में यह कभी सत्य नही था।
एक तो घर में सबसे छोटा था मैं तो शायद सबका प्रेमपात्र तो वैसे भी था उसमे भी आप घर की सर्वश्रेष्ठ वात्सल्य से पूर्ण।
चपल या फिर उद्दंड कहना भी गलत नहीं होगा मेरे बचपन को ,या सच कहीं तो अब तक वही उद्दंडता मेरे व्यक्तित्व में प्रचलित है ,उसी चपलता के कारण मां से तो मेरी कभी बनती नही थी क्योंकि उसे मेरी बदमाशी दिखती थी और मैं पीटने के दर से हमेशा तआपके पल्लू के नीचे छिप जाता था ,और आपके संरक्षण में आने के बाद तो मां भी क्या ही करती ।
खाने के बाद मुझे मीठा खाना बेहद पसंद रहा है जिसको आप बखूबी जानती थीं ,इसीलिए कुछ भी हो मेरे लिए कुछ न कुछ मीठा चाहे वो गुड़ की एक डली भी क्यों न हो मेको जरूर देती थी।
जून जुलाई में जब आइस्क्रीम का ठेला गलियों में आवाज देता था तब मैं दौड़ जाता था आपके पास क्योंकि उस दुपहरी में मम्मी तो आइस्क्रीम खाने देने से रही तब पैसे के लिए उसके पास मुझे व्यर्थ साबित होता था ,लेकिन आपसे मिन्नत करने की ज़रूरत ही न पड़ती, और मैं हमेशा आइस्क्रीम लेकर ही लौटता।
पैसे पाने का सबसे सुलभ जरिया आप ही रही हो मेरा हमेशा ,कुछ तो था स्नेह आपके साथ क्योंकि जब तुमने जीवन के अंत में जब आप अशक्त थी तब भी जब मैंने आपसे ये कहने पर की मम्मी पैसा नही दे रही दादी मुझे कुछ खाना है तब आपके वही शब्द ,जो उसी सहजता से तब निकलते थे जब आप मेरी संरक्षक हुआ करती थी " जो चावल निकाल के दुकान में बेच के ले आओ"
यह पंक्ति को कितना सहजता से कहा था अपने ,उसी स्वामित्व के भाव से की अभी आप जिंदा हो तो पूरा घर का कार्यक्षेत्र आपके अधिकार में ही आता है।
दादी मैं अक्सर कहा करता था की आपके बाद मैं घर से उतना नहीं स्नेह कर पाऊंगा क्योंकि मुझे सच में ऐसा लगता था की आपके गैरमौजूदगी में मेरे बालमन को कौन समझ पाएगा ।
मेरे हठ को बिना जिरह किए कौन ही मानेगा शायद इसीलिए हमेशा आपको खोने से डरता था ।
मुझे याद है जब एक अपशब्द कहने पर बाबा मुझे पीटने को उद्धत हुए थे तब उनके गुस्से के बावजूद आप मुझे बचा लाई थी वहां से ।
बड़ी मां का दर्जा या शायद उससे भी कहीं ऊपर है दादी का दर्जा ....
आपके अशक्त होने के बाद भी आपकी विनोद पूर्ण स्वभाव ,हमेशा कुछ हास्यपूर्ण वाक्य कहने की क्षमता अभी भी मन को गुदगुदा जाती हैं
आपके लिए किसी से भी लड़ जाना,मम्मी के खिलाफ तो विद्रोही मोर्चा मैने काफी बार खोला है ,आपकी सेना में शामिल होकर , पता नही वो मेरी अतिप्रतिक्रियाशिल होना था या कुछ और लेकिन मैने हमेशा ऐसी जरूरत महसूस की कोई भी बात आपके मन के विरुद्ध जाए तो उसका विरोध करना मेरा कर्तव्य है।
पता है दादी जब भी पटना जाता था , हमेशा मन में डर लगा रहता था की बाबा की तरह आप भी मेरे अनुपस्थिति में ही कूच न कर जाओ ,और आपने बार बार मुझे याद करके मेरे कर्तव्य को याद दिलाते रहने का काम किया।
खैर नियति के अनुरूप आप एकदिन अपना तामझाम छोड़कर निकल ही पड़ी उस अनंत की यात्रा पर जिसके कभी न कभी हम सभी पथिक बनेंगे, फिर भी बस चलता ना आपकी जान को न डिबिया में बंद करके रखता और कभी जाने नही देता ,
सामर्थ्य में होता अगर तो यमराज के दूतों से भी मैंने करके आपको वापस बुला लेता अपने पास क्योंकि अपने सुरक्षा कवच को कभी कौन खोने देना चाहता है।
खैर ये तो उद्गार हैं,वास्तविकता से परे नहीं रहा हूं मैं, ,लेकिन आपकी याद जब भी आती है आंखो में एक चमक और होठों पर एक मुस्कुराहट तैर ही जाती हैं,.....
आपका जाना स्वीकार किया है मैने....
क्योंकि दादी
आपका छोटू अब बड़ा हो गया है।
अलविदा ..
आपका छोटू
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