सुरकंडा देवी शक्तिपीठ।
सुरकंडा देवी मंदिर ।
मसूरी से लगभग 45 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है सुरकंडा देवी का मंदिर ,भारतवर्ष के 51 शक्तिपीठों में से एक जहा सती का मस्तक गिरा था ,पौराणिक कथाओं के अनुसार ब्रम्हा जी ने इस स्थान का नाम सुरकुट भी कहा है ,कालांतर में इसका अपभ्रंश बदल।कर सुरकुंडा देवी हो गया है ।
ज्ञात हो कि जब महादेव सती का मृत शरीर लेकर भ्रमण कर रहे थे तब भगवान विष्णु ने उन्हें माया से ग्रस्त जानकर अपने सुदर्शन से उनके शरीर को 51 हिस्सों में काट दिया था जिसका हरेक हिस्सा शक्तिपीठ के नाम से प्रसिद्ध हुआ ।
महादेव का सती के प्रति प्रेम को यहां अगर मैं नही लिखूं तो जैसे शरीर के हृदय को ही विलुप्त कर दूंगा ।
कितना उत्कृष्ट रहा है वो प्रेम ,कितना प्रबल वेग है जिसमें सारी सृष्टि को निगल जाने की शक्ति है ,वो तांडव जिसमे ब्रम्हांड को समाप्त कर देने की क्षमता है ,शिव अपने प्रेम के नष्ट होने पर जैसे चेतावनी दे रहें हो की इतना सहज नहीं है प्रेम का किसी के द्वारा नष्ट किया जाना प्रेम का सबसे विशुद्ध स्वरूप जिसमे दोनो एकाकार हो गए हैं ,शायद इसीलिए भी अर्धनारीश्वर का स्वरूप शिव के अलावा और कहीं नहीं दिखता। समर्पण का उत्कृष्ट स्वरूप।
प्रेम के लिए कृष्ण भी उदाहरणीय हैं लेकिन उन्होंने प्रत्यक्ष रूप से प्रेम को सरल रखा और राधा से उनकी विरक्ति के बाद उनका प्रेम हमेशा से परोक्ष प्रेम रहा लेकिन महादेव ने प्रत्यक्ष रूप से चेतावनी के स्वरूप में प्रेम को परिभाषित किया,
महादेव सा प्रेम करने की सामर्थ्य पाना महादेव के पास ही है।
तो मैं पहाड़ों की बीच ,जिसके दोनो ओर पाइन और चीड़ के वृक्ष पहाड़ों से कद मिलाने की होड़ में अपने सिर को उत्तुंग करके खड़े थे,बड़ा ही मनोरम दृश्य था पहाड़ों से आती ठंडी हवा हृदय को प्रफुल्लित कर रही थी जैसे सारा शरीर नया हो गया हो ,अपनी स्कूटी के साथ जैसे एक अलग ही दुनिया में घूम रहा था ,हम जैसे गंगा दोआब वालों के लिए प्राकृतिक सौंदर्य हमेशा से आकर्षक रहा है जहां पहाड़ों के हृदय स्थली हरे भरे बागानों से भरे पड़े हों ,घाटियों में बैंगनी मिश्रित गुलाबी फूलों के गुच्छे जैसे हृदय चुरा ले जाते हों,
वस्तूतः प्रकृति जब श्रृंगार करती है तो उसके सामने सारी नवयौवनाएं भी नजरें चुराकर ही निकल पाती होंगी।अजीब सा आकर्षण।
मैने रुककर छटाओं को मानस पटल पर कैद किया और फिर दोनो बाहों को फैलाकर उस विहंगम दृश्य को अपने हृदय से लगा लेने का उपक्रम किया ,मुझे नहीं पता ये कितना सही है या गलत लेकिन मन को एक संदेश जाता है की उसे पूरे नयनाभिराम दृश्य ने एक अप्रतिम सौंदर्य की मूर्ति बनकर अपना सिर मेरे वक्षस्थल में छुपा लिया हो और आप उसको अपनी पूरे सामर्थ्य तक अपना पाए हों।
इस सफर पर हरेक क्षण मुझे लगता रहा की गंतव्य से मनोरम तो ये घूमते हुए रास्ते है
करीब एक से दो घंटे के सफर के बाद मुझे चुनरी और पूजा सामग्री की दुकानें दिखनी शुरू हो गई, और फिर पहाड़ो की तलहटी में दिखा मंदिर जाने का रास्ता ,यहां आपको कोई ज्यादा भीड़-भाड़ नही मिलेगी ,करीब दो किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई के बाद शिखर पर आपको माता का मंदिर दिख जाएगा ,अगर आप चाहे तो रोपवे का इस्तेमाल भी कर सकते हैं जिसका किराया तकरीबन दो सौ रुपए तक आएगा नही तो आप पैदल मार्ग से अपनी चढ़ाई प्रारंभ कर सकते हैं।
दोपहर की धूप के बीच हवा की ठंडक आपको दिसंबर की सर्दी का एहसास करवा देगी ,जब बिहार और यूपी में गर्मी से लोग त्रस्त हो रहे होंगे तब आप खुद को गर्म कपड़े न लाने की वजह से कोस रहे होंगे।
सुरकंडा देवी के मंदिर पंहुचने के बाद मैने माता का दर्शन किया ,यहां माता की मूर्ति शीला रूप में जिसमे पूरी आकृति उकेरी हुई है दिख जाएगी,वहां पुजारी जी से ज्ञात हुआ की ये सदेह मूर्ति स्वयंभू है जो जड़धारी गांव के एक व्यक्ति को माता के प्रेरणा स्वरूप प्राप्त हुआ था,जड़धारी वंश के साथ माता का संबंध के विषय में एक कहानी ज्ञात हुई जो काफी रोचक लगी।
जड़धारी गांव के व्यक्ति के द्वारा माता की प्राण प्रतिष्ठा के एवज में वो गांव माता का मायका के रूप में प्रचारित है जहा के लोग हरेक तीसरे साल माता को अपने मायके अर्थात जड़धारी गांव चैत्र नवरात्र में बुलाते हैं ,नंगे पांव चल मूर्ति को सिर पर रखकर करीब सोलह किलोमीटर तक चलकर अपनी बेटी को मायके ले जाते हैं और नवरात्रि के पश्चात नाम आंखो से मंदिर के लिए विदा करते हैं।इस गांव के लोग माता के चढ़ावे और मंदिर के किसी आय को कोई हिस्सा नहीं लेते जोकि भारत का हरेक पिता अपनी बेटी के ससुराल का कुछ नही लेता ,यहां के लोग माता के मामा कहलाते हैं।
कितना सहज प्रेम और रिश्ता है जगतजननी माता के साथ ,प्रेम का सहज स्वरूप जिसमे दिव्य शक्तियों को अपने रिश्तों से बांध दिया जाता है ताकि अध्यात्म का मार्ग सुगम हो जाए।
हमने वहां करीब एक घंटे बिताए, वहां लगे सूचना पट्ट से ज्ञात हुआ की सुरकंडा माता के नाम से कहीं डोली नचाई जाती है जोकि दावा करते हैं सुकंडा माता के दरबार का जबकि असली शक्तिपीठ जहां माता विराजमान है वहां ऐसी कोई प्रथा प्रचलन में नही है।
चारों तरफ के दृश्य को मन में सहेजकर अगली बार फिर जल्दी से जल्दी चक्कर लगाने की इच्छा लेकर हम समय की कमी के कारण वापस अपने गंतव्य के लिए निकल गए।
सत्यम
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